देवरिया में भाजपा विधायकों की क्या है जमीनी हकीकत, पत्रकारों ने समझा दिया पूरा समीकरण

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो गई है. इसी कड़ी में पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख सियासी गढ़ देवरिया जिले की सातों विधानसभा सीटों पर चुनावी हलचल तेज हो गई है. वर्तमान में देवरिया की सातों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है. लेकिन आगामी चुनाव को लेकर जिले के वरिष्ठ पत्रकारों और सियासी विश्लेषकों का मानना है कि इस बार बीजेपी एंटी-इंकंबेंसी से निपटने के लिए ‘गुजरात मॉडल’ अपनाते हुए अपने आधे से ज्यादा विधायकों के टिकट काट सकती है. समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) कार्ड, स्थानीय नाराजगी और युवाओं व महिला वोटरों के रुझान के बीच देवरिया की सातों सीटों का चुनावी गणित बेहद दिलचस्प नजर आ रहा है.
देवरिया सदर और पथरदेवा: बीजेपी के मजबूत किले
भाटपार रानी, रामपुर कारखाना और सलेमपुर: कांटे की टक्कर और ‘पीडीए’ का असर
इन सीटों पर विपक्ष (सपा) और बीजेपी के बीच बेहद कड़ा मुकाबला होने का अनुमान है.
बरहज और रुद्रपुर: टिकट बदलाव और जातीय लामबंदी
बरहज: यहां से बीजेपी के दीपक मिश्रा ‘शाका’ करीब 16,000 वोटों से जीते थे. लेकिन इस बार परिस्थितियां बदल रही हैं। बीजेपी यहां नया प्रत्याशी उतार सकती है, वहीं सपा भी मजबूत उम्मीदवार की तलाश में है.
रुद्रपुर: जय प्रकाश निषाद का अपनी बिरादरी और कैडर वोट बैंक में दबदबा कायम है जिससे यह सीट बीजेपी के लिए सुरक्षित मानी जा रही है.
टिकट बदलने की रणनीति और निर्णायक वोटर
वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार बीजेपी अक्सर नाराजगी दूर करने के लिए सीटिंग विधायकों के टिकट काटती रही है. 2022 में देवरिया में 5 टिकट बदले गए थे और बीजेपी ने सातों सीटें जीती थीं. 2027 में भी यही प्रयोग दोहराया जा सकता है.
महिलाएं और युवा वोटर होंगे गेमचेंजर: सरकार की मुफ्त राशन और कल्याणकारी योजनाओं के चलते महिला वोटर बीजेपी का मजबूत आधार बनी हुई हैं. दूसरी तरफ, जेनरेशन-जी (Gen-Z) और युवा वोटर रोजगार व नीट (NEET) जैसे मुद्दों को लेकर अपनी नई राय बना रहे हैं.
एक देश-एक चुनाव का सस्पेंस: यदि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू होता है, तो 2027 की सरकार का कार्यकाल छोटा हो सकता है जिसका असर प्रत्याशियों के चुनावी बजट और रणनीति पर पड़ेगा.









