केंद्र ने बेअंत सिंह हत्याकांड में राजोआना की मौत की सजा को कम करने का विरोध किया

केन् द्र ने 1995 में पंजाब के पूर्व मुख् यमंत्री बेअंत सिंह की हत् या के मामले में मौत की सजा सुनाए गए बलवंत सिंह राजोआना की उस याचिका का विरोध किया है, जिसमें मौत की सजा को कम करने की मांग की गई है।
30 साल से अधिक समय से हिरासत में चल रहे राजोआना ने 2012 से राष्ट्रपति के समक्ष लंबित दया याचिका पर फैसला करने में देरी को लेकर उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
केंद्र की ओर से बुधवार को पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि केंद्र ने इस मांग पर आपत्ति जताई है और राज्य की मौजूदा स्थिति को देखते हुए कोई निर्णय लेना अनुकूल नहीं होगा।
याचिका पर केंद्र के विरोध के मद्देनजर, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने कहा कि वह गुण-दोष के आधार पर मामले की सुनवाई करेगी।
नटराज द्वारा मामले की तैयारी के लिए समय मांगने के बाद अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए 28 अक्टूबर की तारीख तय की।
बब्बर खालसा के आतंकवादी राजोआना को पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या में भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया था, जो 31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ में पंजाब और हरियाणा सिविल सचिवालय के बाहर एक आत्मघाती बम विस्फोट में मारे गए थे।
विस्फोट में हमलावर दिलावर सिंह और 17 अन्य लोगों की भी मौत हो गई थी।
एक विशेष अदालत ने जुलाई 2007 में राजोआना को मौत की सजा सुनाई थी, जिसे पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2010 में बरकरार रखा था।
उसकी फांसी 31 मार्च 2012 को तय की गई थी, लेकिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) द्वारा उसकी ओर से दया याचिका दायर करने के बाद इस पर रोक लगा दी गई थी।
2019 में, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुरु नानक देव की 550 वीं जयंती से जुड़े उपायों के हिस्से के रूप में राजोआना की मौत की सजा को कम करने के निर्णय की घोषणा की।
अपनी दया याचिका पर बाद में कोई निर्णय नहीं होने के कारण, राजोआना ने लंबी देरी को लेकर 2020 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
केंद्र और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने राष्ट्रीय सुरक्षा और पंजाब में कानून-व्यवस्था की स्थिति की ओर इशारा करते हुए उन्हें राहत देने का विरोध किया।
3 मई, 2023 को, सुप्रीम कोर्ट ने उसकी मौत की सजा को कम करने से इनकार कर दिया और उसकी दया याचिका से निपटने के लिए इसे सक्षम प्राधिकारी पर छोड़ दिया।
राजोआना ने 2024 में फिर से शीर्ष अदालत का रुख किया, जिसमें उनकी मौत की सजा को इस आधार पर कम करने की मांग की गई कि उनकी दया याचिका पर फैसला करने में लंबे समय तक देरी ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीवन के अधिकार का उल्लंघन किया है।









