बिहारराज्य

बिना DEO की मंजूरी के कैसे हुआ शिक्षकों का प्रतिनियोजन? अररिया सदर प्रखंड में हुआ है बड़ा खेल, रडार पर पूर्व BEO

 शिक्षा विभाग में नियमों को ताक पर रखकर चहेते शिक्षकों को उपकृत करने और आरामतलबी के लिए सुगम विद्यालयों में बैठाने का बड़ा खेल उजागर हुआ है। जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) से बिना किसी सक्षम अनुमोदन के अररिया सदर प्रखंड में सात शिक्षक-शिक्षिकाओं की की गई मनमानी प्रतिनियुक्ति को डीपीओ स्थापना ने रद तो कर दिया है।

लेकिन इस कार्रवाई के बाद समूचे शिक्षा विभाग की कार्यशैली और प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल उठ रहा है कि जब सामान्य परिस्थिति में शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति पर विभागीय स्तर से पूर्ण प्रतिबंध है, तो आखिर किस अधिकार और मजबूरी के तहत इन शिक्षकों को दूसरे विद्यालयों में भेजा गया था? वह भी सिर्फ सदर प्रखंड के उन विद्यालयों में, जो जिला मुख्यालय के बिल्कुल करीब स्थित हैं।

पूर्व बीईओ की भूमिका पर सवाल

विभागीय सूत्रों की मानें तो पूर्व में सदर प्रखंड में पदस्थापित रहे एक प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (बीईओ) ने अपने कार्यकाल के दौरान नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए मुख्यालय के आसपास के विद्यालयों में कई शिक्षकों का प्रतिनियोजन कर दिया था। हैरानी की बात यह है कि यह तैनाती ऐसे विद्यालयों में भी कर दी गई जहां छात्र-शिक्षक अनुपात के अनुसार पहले से ही जरूरत से ज्यादा शिक्षक पदस्थापित थे।

छात्र-शिक्षक अनुपात को भी किया दरकिनार

हैरतअंगेज पहलू यह भी है कि इन सात शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति किस तारीख को और किस पत्र के आलोक में की गई थी, इसका कोई स्पष्ट ब्योरा डीपीओ स्थापना कार्यालय के संचिकाओं में दर्ज ही नहीं है। जानकारों का कहना है कि सुदूर ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में पढ़ाने से बचने के लिए शिक्षकों ने ‘सेटिंग’ के दम पर मुख्यालय के पास यह सुरक्षित ठिकाना तलाशा था।

डीईओ कार्यालय में शिक्षकों की बाबूगीरी पर भी उठे सवाल

सदर प्रखंड के स्कूलों के अलावा जिला शिक्षा कार्यालय (डीईओ ऑफिस) की कार्यप्रणाली भी संदेह के घेरे में आ गई है। चर्चा है कि कई शिक्षक अपने मूल विद्यालय में अध्यापन कार्य छोड़कर डीईओ कार्यालय में गैर-शैक्षणिक कार्यों यानी बाबूगीरी में जुटे हुए हैं। यदि शिक्षक विद्यालय में पदस्थापित रहते हुए दफ्तरों में फाइलें निपटा रहे हैं, तो इसके लिए सक्षम स्तर से निर्गत आदेश और उनकी विद्यालय उपस्थिति के सत्यापन पर सवाल उठना लाजिमी है।

अब शिक्षक संगठनों और प्रबुद्ध नागरिकों के बीच यह चर्चा तेज है कि विभाग केवल सात शिक्षकों का प्रतिनियोजन रद्द कर मामले पर पर्दा डालेगा या फिर अनाधिकृत आदेश जारी करने वाले पूर्व अधिकारियों और कार्यालय में जमे शिक्षकों की भूमिका की भी उच्चस्तरीय जांच कराएगा।

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