
उच्चतम न्यायालय में 27 अक्टूबर को उस याचिका पर सुनवाई हो सकती है जिसमें ‘वंदे मातरम’ गीत को राष्ट्रगान के बराबर दर्जा देने की मांग करने वाली जनहित याचिका को दिल्ली उच्च न्यायालय से स्थानांतरित करने की मांग की गई है।
शीर्ष अदालत की वेबसाइट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करेगी।
वकील अश्विनी दुबे के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि जनहित याचिका को दिल्ली उच्च न्यायालय से शीर्ष अदालत में स्थानांतरित किया जाए क्योंकि इसी तरह की रिट याचिका उसके समक्ष लंबित है।
‘वंदे मातरम’ हमारे इतिहास, संप्रभुता, एकता और गौरव का प्रतीक है। यदि कोई नागरिक किसी भी प्रत्यक्ष या गुप्त कार्य से उसका अनादर करता है, तो यह न केवल एक असामाजिक गतिविधि होगी, बल्कि यह एक संप्रभु राष्ट्र के नागरिक के रूप में हमारे सभी अधिकारों और अस्तित्व के लिए भी विनाश का कारण बनेगी।
उन्होंने कहा, ”इसलिए प्रत्येक नागरिक को न केवल ऐसी किसी भी गतिविधि से बचना चाहिए, बल्कि अगर कोई शरारती ‘वंदे मातरम’ का अनादर करने की कोशिश करता है तो उसे रोकने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। हमें अपने राष्ट्र, अपने संविधान, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज पर गर्व करना चाहिए और राष्ट्रीय हित को अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखना चाहिए और तभी हम अपनी कड़ी मेहनत से अर्जित स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा कर पाएंगे। यह कार्यपालिका का कर्तव्य है कि वह ‘वंदे मातरम’ को बढ़ावा देने और प्रचारित करने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाए।
जनहित याचिका (पीआईएल) यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि गीत को सम्मानित किया जाए और उसे राष्ट्रगान के समान दर्जा दिया जाए।
याचिकाकर्ता ने केंद्र और दिल्ली सरकार से यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की है कि सभी स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में हर कार्य दिवस पर ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ बजाया और गाया जाए।
याचिकाकर्ता ने कहा है कि इस गीत ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है और 1950 में संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद द्वारा दिए गए बयान के मद्देनजर इसे ‘जन गण मन’ के रूप में सम्मानित किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘देश को एकजुट रखने के लिए यह सरकार का कर्तव्य है कि वह ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाए। ऐसा कोई कारण नहीं है कि इसमें कोई अन्य भावना पैदा हो, क्योंकि दोनों संविधान निर्माताओं द्वारा तय किए जाते हैं।
उन्होंने कहा, ‘जन गण मन’ में व्यक्त की गई भावनाओं को राज्य को ध्यान में रखते हुए व्यक्त किया गया है। हालांकि, ‘वंदे मातरम’ में व्यक्त भावनाएं देश के चरित्र और शैली को दर्शाती हैं और इसी तरह के सम्मान की पात्र हैं।
याचिका में कहा गया है कि ‘वंदे मातरम’ का कोई नाटकीयकरण नहीं होना चाहिए और इसे किसी भी तरह के शो में शामिल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि जब भी इसे गाया या बजाया जाता है, तो वहां मौजूद सभी लोगों के लिए उचित सम्मान और सम्मान दिखाना जरूरी है।









