राष्ट्रीय

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज के संस्मरण पर कांग्रेस ने उठाया सवाल- न्यायपालिका की ‘आजादी’ पर कांग्रेस ने उठाए सवाल

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल के संस्मरण का हवाला देते हुए कांग्रेस ने रविवार को मोदी सरकार के तहत न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बारे में ‘गंभीर सवाल’ उठाए और कहा कि संविधान को बनाए रखने वाली संस्था को सत्ता में बैठे लोगों के दबाव से मुक्त रहना चाहिए।

‘सरकार के प्रति बहुत सम्मानजनक’

कांग्रेस महासचिव और संचार मामलों के प्रभारी जयराम रमेश ने एक मीडिया रिपोर्ट साझा की, जिसमें कौल के संस्मरण ‘विदाउट फियर ऑफ फेवर’ की पांडुलिपि का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ नियुक्तियों के मामले में ‘सरकार के प्रति बहुत सम्मानजनक’ थे।

रमेश ने एक्स पर हिंदी में अपने पोस्ट में कहा, “सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की एक पुस्तक ने मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बारे में गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति कौल ने न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकारी हस्तक्षेप, कॉलेजियम की बैठकों से पहले सरकार की मंजूरी हासिल करने के प्रयास और अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित न्यायाधीश की जाति के बारे में सरकार की बेतुकी पूछताछ जैसी कई संबंधित घटनाओं को उजागर किया।

न्यायिक नियुक्तियों में सरकार की ‘भूमिका’ पर सवाल

रमेश ने कहा कि जिन मामलों पर पहले कई लोग खुलकर चर्चा करने में झिझकते थे, उन्हें अब न्यायमूर्ति कौल ने नपे-तुले और जानबूझकर भाषा में पेश किया है।

उन्होंने कहा, ‘चौंकाने वाली बात यह है कि भारत के एक पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ने इस बात से इनकार नहीं किया है कि न्यायिक नियुक्तियों से पहले सरकार के साथ चर्चा होती है. जब पूर्व सीजेआई जस्टिस चंद्रचूड़ स्वीकार करते हैं कि सरकार सीजेआई के साथ जुड़ती है और नियुक्ति प्रक्रिया में भूमिका निभाती है, तो न्यायिक स्वतंत्रता के बारे में चिंताएं और भी गहरी हो जाती हैं।

‘संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाली पीठों में बदलाव किया गया’

उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति कौल का यह खुलासे भी उतना ही गंभीर है कि उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने पीएमएलए (धन शोधन रोकथाम अधिनियम) मामले में अदालत के फैसले के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार करने की संभावना जताई थी, जिसके बाद उनके साथ परामर्श किए बिना मामले को एक अलग पीठ को सौंप दिया गया था।

रमेश ने कहा, ‘यह इस बात की ओर इशारा करता है कि सुप्रीम कोर्ट के कामकाज में सरकार दिन-प्रतिदिन के हस्तक्षेप की हद तक है।

कांग्रेस नेता ने कहा, ‘जब न्यायिक नियुक्तियों के लिए सरकार की मंजूरी लेने का दबाव होता है और जब संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाली पीठों को बदला जाता है, तो लोकतंत्र की रक्षा के हित में यह पूछना चाहिए कि अगर यह न्यायपालिका पर दबाव नहीं बनाता है और इसकी स्वतंत्रता का क्षरण नहीं करता है, तो क्या करता है?’

उन्होंने कहा, ‘संविधान को बनाए रखने का काम करने वाली संस्था को सत्ता में बैठे लोगों के दबाव से मुक्त रहना चाहिए। लोकतंत्र में, न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल एक विकल्प नहीं है; यह एक परम आवश्यकता है, “रमेश ने जोर देकर कहा।

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