
स्वर्गीय सज्जन कुमार कभी अकेले नहीं थे और न ही उनकी नियति उनकी अपनी थी।यह उन लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ था, जिनके परिवार 1984 के सिख विरोधी दंगों के चरम पर भीड़ की खून की लालसा से बर्बाद हो गए थे।
80 वर्षीय कुमार का निधन हो गया है, लेकिन सांप्रदायिक नरसंहार में बचे कई लोग अपने जीवन की आखिरी सांस तक उन काले दिनों की भयावहता को फिर से जी रहे हैं।ऐसी ही एक जीवित बची अमृतसर की जगदीश कौर हैं, जिन्होंने द ट्रिब्यून से अपने दर्द और निराशा के बारे में बात की।
सज्जन कुमार के खिलाफ हत्या के मामले में उनकी गवाही ही के कारण उन्हें दंगों में पहली बार दोषी ठहराया गया।गौरतलब है कि 17 दिसंबर, 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने पूर्व कांग्रेस सांसद को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को पलट दिया था, जिस पर जगदीश कौर के पति, उनके 18 वर्षीय बेटे और उनके तीन चचेरे भाइयों की हत्या का आरोप था।









