1991 के फर्जी मुठभेड़ मामले में दर्जनों लोगों को फंसाने के आरोप में 12 पूर्व पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज

नई दिल्ली: सीबी-सीआईडी की जांच में 12 लोगों को कथित तौर पर लूट के मामले में फंसाने के 35 साल बाद कानपुर में 12 सेवानिवृत्त पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है.
सीबी-सीआईडी इंस्पेक्टर सुशील कुमार की शिकायत पर महाराजपुर पुलिस थाने में पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं के तहत सबूत गढ़ने, झूठे आरोप, गलत तरीके से बंधक बनाने और चोट पहुंचाने के बारे में प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल ने बताया कि आईपीसी की धारा 194, 195, 182, 211, 218, 220, 323 और 342 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
जांच में तत्कालीन थाना अधिकारी विद्यासागर त्रिपाठी और जांच अधिकारी रमेश चंद्र भटोले सहित 18 पुलिसकर्मियों के नाम थे। लाल ने कहा कि उनमें से छह की मौत हो चुकी है।
प्राथमिकी के अनुसार, पुलिस टीम को 22 अगस्त, 1991 को एक गुप्त सूचना मिली थी कि हथियारबंद लोगों का एक समूह जीटी रोड पर नरवल मोड़ के पास वाहनों को लूटने की योजना बना रहा है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया कि पुलिस ने दावा किया कि संदिग्धों ने 23 अगस्त को देर रात करीब 12.30 बजे बबूल की शाखाओं से सड़क को अवरुद्ध कर दिया, जिसके बाद मुठभेड़ शुरू हो गई जिसमें राकेश पाठक सहित 12 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।
अधिकारी ने बताया कि इन लोगों के पास से कथित तौर पर हथियार और विस्फोटक बरामद किए गए हैं।
हालांकि, बाद में सीबी-सीआईडी जांच में पुलिस के बयान को मनगढ़ंत पाया गया।
डीसीएम वाहन के चालक और क्लीनर उमाशंकर पासी और विजेंद्र सिंह ने सीबी-सीआईडी जांचकर्ताओं को बताया कि पुलिस ने लोगों को उठाया और उन्हें अपने वाहन से महाराजपुर पुलिस स्टेशन ले गई। उन्होंने इस बात से इनकार किया कि घटनास्थल पर लूट का कोई प्रयास या मुठभेड़ हुई थी।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन लोगों पर हमला किया गया और हथियारों की कथित बरामदगी मनगढ़ंत थी।
यह मामला राकेश के बड़े भाई देव प्रसाद पाठक की शिकायत से शुरू हुआ, जिन्होंने आरोप लगाया कि त्रिपाठी ने बिना भुगतान के परिवार से 400 वर्ग गज के प्लॉट की मांग की थी।
देव प्रसाद ने संवाददाताओं से कहा कि जब उन्होंने भूखंड सौंपने से इनकार कर दिया, तो तत्कालीन थाना अधिकारी ने कथित तौर पर अपने भाई और उसके सहयोगियों को लूट के मामले में फंसाया।
उन्होंने कहा, “मैंने उसे प्लॉट देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद मेरे भाई के खिलाफ डकैती का मामला दर्ज किया गया।
उन्होंने कहा कि उन्होंने उच्च न्यायालय से अपने भाई की जमानत हासिल करने के बाद सीबी-सीआईडी जांच की मांग की।
एक अधिकारी ने बताया कि जांच रिपोर्ट को 25 सितंबर 1995 को लखनऊ स्थित सीबी-सीआईडी मुख्यालय ने मंजूरी दी थी।
राकेश के भाई ने बताया कि आठ मई 2003 को कानपुर में एक सड़क दुर्घटना में राकेश की मौत हो गई थी।
एफआईआर में जिन लोगों के नाम हैं, उनमें सब-इंस्पेक्टर बीडी सारस्वत, योगेंद्र नाथ सिंह और रमेश चंद्रा शामिल हैं। हेड कांस्टेबल हृदय नारायण तिवारी; कॉन्स्टेबल तेज नारायण तिवारी, बैजनाथ, बृजेश कुमार, चंद्रबाली, विद्याकांत शुक्ला, राम आसरे और रमेश कुमार तिवारी; और ड्राइवर जागेश्वर प्रसाद।
आगे की जांच चल रही है।







