42 नरकंकालों के बाद 88 साल से दफन है रहस्य! अब उज्जैन की वैश्य टेकरी फिर उगलेगी इतिहास; ASI ने भेजा खोदाई का प्रस्ताव

वर्ष 1938 में जब उज्जैन के उंडासा क्षेत्र की कुम्हार टेकरी और वैश्य टेकरी पर ग्वालियर स्टेट के तत्कालीन पुरातत्वविद् डा. एमबी गर्दे ने खोदाई शुरू की, तो दोनों स्थानों पर अलग-अलग अवस्थाओं में 42 नरकंकाल और प्राचीन सामग्री मिली।
बौद्धकाल के बताए जाते हैं कंकाल
सभी नरकंकाल बौद्धकाल के बताए जाते हैं। इसके साथ ही मृदभांड, पंचमार्क मुद्राएं और अन्य पात्र मिले थे। सिक्के तांबे के थे। ये सभी अवशेष कोलकाता स्थित भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण के म्यूजियम में भेजे गए थे। वहां आज भी सुरक्षित हैं।
इसके बाद से अब तक इस क्षेत्र में दोबारा खोदाई नहीं हुई, लेकिन अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के भोपाल मंडल ने इस स्थल की खोदाई का प्रस्ताव केंद्र को भेजा है। ऐसे में, इस स्थान का इतिहास फिर सामने आ सकता है।

खोदाई से खुलेंगे राज
भोपाल मंडल के अधीक्षक पुरातत्वविद् शिवाकांत वाजपेयी ने बताया कि वैश्य टेकरी की खोदाई का प्रस्ताव केंद्रीय मुख्यालय को भेजा है। कुम्हार टेकरी भी इसके पास है। वैश्य टेकरी की खोदाई होने पर कुम्हार टेकरी से संबंधित जानकारी भी मिल सकती है। दोनों के बीच कोई संबंध है तो वह भी समझ में आएगा।
वहीं, कुम्हार टेकरी और वैश्य टेकरी के आसपास के स्थानीय लोगों का कहना है कि 1938 में खोदाई के दौरान जमीन से जहरीली गैस निकलने के कारण कई मजदूर बेहोश हो गए थे, जिसके बाद खोदाई बंद कर दी गई। अब वैश्य टेकरी के आसपास करीब 40 वर्षों से खेती की जा रही है।

बैठे हुए, उल्टे लेटे हुए कंकाल
वर्ष 2007 में इस संबंध में कार्य कर चुकी डेक्कन कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे की एसोसिएट प्रोफेसर डा. वीणा मुशरीफ त्रिपाठी ने बताया कि पुरातत्व संबंधी खोजों और कंकालों के आधार पर कहा जा सकता है कि ये लोग संभवतः अलग-अलग समुदायों से थे। कंकाल अलग-अलग स्थितियों में मिले हैं, जैसे बैठे हुए, पीठ के बल या उल्टे लेटे हुए और पैर मुड़े हुए।
खोदाई की रिपोर्ट से पता चलता है कि लोग शवों को दफनाने और संभवतः दाह-संस्कार के अलग-अलग तरीकों का पालन करते थे। इनमें बच्चे और वयस्क दोनों तथा स्त्री-पुरुषों के कंकाल मिले हैं।

बौद्ध स्मारक है वैश्य टेकरी
उज्जैन में तराना रोड पर स्थित वैश्य टेकरी बौद्ध समुदाय के लिए किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं है। उज्जैन पर शोधपूर्ण लेखन करने वाले 90 वर्षीय वरिष्ठ लेखक रमेश दीक्षित ने अपनी पुस्तक ‘उज्जयिनी : अक्षर ऐश्वर्य’ में इसका उल्लेख किया है। उनके अनुसार यह टेकरी मौर्यकालीन स्तूप के भग्नावशेषों को मिट्टी से ढके हुए है। यह बौद्धकालीन पुरा-संपदा केंद्रीय पुरातत्व विभाग के सीधे नियंत्रण में है।








