मध्य प्रदेशराज्य

भोपाल से डबरा तक फर्जी पासपोर्ट का जाल! बौद्ध अनुयायी बताकर बनवाए 70 पासपोर्ट; एक के लिए 25 हजार लेता था मास्टरमाइंड

ग्वालियर के बाद भोपाल के एक बौद्ध मठ के पते पर 40 फर्जी पासपोर्ट बनाए जाने का मामला सामने आने से सुरक्षा एजेंसियों में हड़कंप है। इस पूरे नेटवर्क में मास्टरमाइंड बताए जा रहे रियाल चौधरी की भूमिका संदेह के घेरे में है। स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने उसे गिरफ्तार कर लिया है और पूछताछ में उसने एक पासपोर्ट तैयार कराने के बदले 25 हजार रुपये लेने की बात कबूल की है।

जांच की शुरुआत ग्वालियर के डबरा में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर तैयार पासपोर्ट के मामले से हुई थी। पड़ताल आगे बढ़ी तो सामने आया कि डबरा स्थित एक बौद्ध मठ के पते पर 17 पासपोर्ट बनाए गए हैं। इसी तरह भोपाल के एक बौद्ध मठ के पते पर 40 फर्जी पासपोर्ट तैयार किए जाने की जानकारी मिली है। अब एसटीएफ यह जांच कर रही है कि इन लोगों को दस्तावेजों में बौद्ध अनुयायी बताने के पीछे कोई सुनियोजित रणनीति तो नहीं थी।

बांग्लादेश कनेक्शन खंगाल रही एसटीएफ

जांच में रियाल चौधरी के बांग्लादेशी होने की जानकारी सामने आई है। एसटीएफ को पता चला है कि उसने असम के कामरूप जिले में अपने निवास से संबंधित दस्तावेज भी तैयार करा लिए थे। इसके बाद वह बैतूल आ गया। इसी कड़ी को जोड़ते हुए एसटीएफ की एक टीम बांग्लादेश कनेक्शन की पड़ताल के लिए असम पहुंची है।

जांच एजेंसी अब फर्जी पासपोर्ट हासिल करने वाले अन्य लोगों की भी कुंडली खंगाल रही है। यह पता लगाया जा रहा है कि वे भारत में कब आए, कितने समय से यहां रह रहे हैं और इससे पहले कहां रहते थे। सभी संदिग्ध पासपोर्ट 2021 से 2023 के बीच बनाए गए हैं।

70 फर्जी पासपोर्ट मिले, चार गिरफ्तार

अब तक इस नेटवर्क से जुड़े 70 फर्जी पासपोर्ट सामने आ चुके हैं। इनमें डबरा के 17, भोपाल के 40, बैतूल के 11 तथा छिंदवाड़ा और पांढुर्णा के एक-एक पासपोर्ट शामिल हैं। मामले में एसटीएफ अब तक चार आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है।

पूछताछ में सामने आया है कि इन पासपोर्ट को बौद्ध अनुयायी बताकर बौद्ध मठों के पते पर तैयार कराया गया था। इसके लिए जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। ऐसे में दस्तावेजों के सत्यापन की सरकारी प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। एसटीएफ यह भी जांच कर रही है कि फर्जी दस्तावेजों के सत्यापन और पासपोर्ट जारी होने की प्रक्रिया में किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की मिलीभगत तो नहीं थी।

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