
बंदोबस्ती प्रक्रिया शुरू करने की अधिसूचना जारी होते ही पहाड़ में बंद पत्थर उत्खनन कार्य का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
इसे लेकर जिले के लोगों में खुशी है कि देर से ही सही लेकिन जिला प्रशासन व सरकार का यह निर्णय क्षेत्र में खुशहाली लाने में कारगर साबित होगा।
खनन कार्य शुरू होने से लगभग डेढ़ दशक से छाई वीरानगी जहां दूर होगी, वहीं बड़े पैमाने पर भी रोजगार के अवसर मिलेंगे। कैमूर पहाड़ी से निकले पत्थर से बना चक्की-जता व सिलबट्टा जैसे स्थानीय उत्पाद एक बार फिर बढ़ावा मिलेगा।
कभी मजदूरों की आवक से गुजारा रहने वाले अमरा-तालाब व बांसा में लगने वाली साप्ताहिक बाजार की भी रौनक बढ़ेगी।
बड़े पैमाने पर मिलेगा रोजगार
पत्थर खदान फिर शुरू होने से रोहतास ही नहीं राज्य के समीपवर्ती औरंगाबाद, कैमूर के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ राज्यों से जुड़े लोगों को रोजगार मिलेगा।
गिट्टी तोड़ने के अलावा काफी संख्या में लोग सिलबट्टा-चक्की-जाता, पटिया बनाने के कार्य में लगेंगे। इससे इन कार्य में लगने वाले मजदूरों व उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी।
सिलबट्टा-चक्की-जाता, पटिया की मांग एक बार फिर पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बढ़ेगी। हालांकि विभाग ने फिलहाल गायघाट व गिजुआही मौजा के दो ही ब्लॉक में पत्थर खनन कार्य शुरू करने का निर्णय लिया है।
शुरुआती दौर में रोजगार मिलने की गति धीमी तथा आने वाले दिनों में रोजगार की गति में तेजी आने की उम्मीद लोगों द्वारा जताई जा रही है।
साप्ताहिक बाजार की बढ़ेगी रौनक
जब पूर्व में पत्थर खदान चालू थे, तो उस वक्त अमरा-तालाब व बांसा में लगने वाली साप्ताहिक बाजार की अपनी पहचान थी। गांवों से छोटे-छोटे व्यापारी चावल व सब्जी लाकर बेचते थे।
लेकिन जून 2012 में पत्थर खदान को खनन कार्य से पूरी तरह मुक्त कर देने के बाद इन दोनों जगह बाजार की रौनक धीरे-धीरे फीकी पड़ती गई। अमरा तालाब पर जहां गुरुवार व रविवार तो बांसा में शनिवार को विशेष बाजार लगते थे, जहां खरीदारों की भीड़ देखते बनती थी।








