जस्टिस वर्मा से मुलाकात करने से पहले नेताओं से सलाह मशविरा करेंगे लोकसभा अध्यक्ष

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बुधवार को कहा कि वह राजनीतिक दलों के नेताओं से परामर्श करेंगे और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया पर नियमों की जांच करेंगे।
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति ने अगस्त में संसद के दोनों सदनों में सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कहा था कि उनके खिलाफ अस्पष्टीकृत नकदी, परेशान करने वाले सबूत और टालमटोल करने वाले स्पष्टीकरण के आरोप साबित हो गए हैं।
न्यायमूर्ति वर्मा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अपना इस्तीफा दे दिया है, लेकिन कानून मंत्रालय ने अभी तक उनके इस्तीफे को अधिसूचित नहीं किया है। उनका नाम अभी भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सूची में शामिल है।
उन्होंने कहा, ‘नियमों को देखेंगे और इसकी जांच करेंगे। बिरला ने यहां एक सम्मेलन से इतर संवाददाताओं से कहा, ‘हम भविष्य में कोई भी कदम उठाने से पहले राजनीतिक दलों के नेताओं से भी विचार-विमर्श करेंगे।
सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों गठबंधनों के विभिन्न राजनीतिक दलों के करीब 200 सांसदों द्वारा संसद द्वारा उन्हें हटाने की मांग करने के बाद जांच समिति का गठन किया गया था।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा भेजे गए इस्तीफे के बारे में पूछे जाने पर, सूत्रों ने कहा कि जब कोई उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश इस्तीफा देता है, तो इसे आमतौर पर स्वीकार माना जाता है।
हालांकि, जस्टिस वर्मा के मामले में संसद में पद हटाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद ही इस्तीफा पत्र भेजा गया था। इसलिए उनका इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है।
14 मार्च, 2025 की रात को दिल्ली में जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास में आग लग गई। आग बुझाने के लिए बुलाए गए दमकलकर्मियों ने कथित तौर पर एक स्टोररूम में भारी मात्रा में जली हुई मुद्रा की खोज की।
न्यायमूर्ति वर्मा को 14 मार्च को यहां उनके आधिकारिक आवास पर जले हुए नोटों के ढेर मिलने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस भेज दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के प्रासंगिक कानूनों और फैसलों का हवाला देने के बाद, दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने पाया कि न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के थे और उन्होंने “आंतरिक प्रक्रिया” का पालन किया।
भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने आरोपों की आंतरिक जांच शुरू की थी और जांच करने के लिए मार्च 2025 में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था।
रिपोर्ट मिलने के बाद सीजेआई ने जस्टिस वर्मा से इस्तीफा देने या महाभियोग की कार्यवाही का सामना करने को कहा।
हालांकि, चूंकि न्यायमूर्ति वर्मा ने उस समय इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था, इसलिए तत्कालीन सीजेआई खन्ना ने न्यायाधीश को हटाने के लिए रिपोर्ट और उस पर न्यायाधीश की प्रतिक्रिया राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दी थी।
बिरला ने पिछले साल अगस्त में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने के लिए एक बहुदलीय नोटिस स्वीकार करने के बाद उनके खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था, जिससे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो गई थी।
स्पीकर बिरला ने कहा था कि बेदाग चरित्र और वित्तीय और बौद्धिक अखंडता न्यायपालिका में एक आम व्यक्ति के विश्वास की नींव है।







