Delhi Election: ‘0’ पर आउट होकर भी कांग्रेस ने किया असली खेल, जानिए कैसे

नई दिल्ली-दिल्ली की जनता ने अपना फैसला सुना दिया है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों से दिल्लीवालों ने जिस पार्टी को अपने दिल में जगह दी थी, उसे सत्ता से बाहर कर दिया है। दिल्ली में आखिरकार ‘मोदी मैजिक’ चल ही गया। लेकिन ‘असली खेल’ किया फिर से शून्य पर आउट होने वाली कांग्रेस ने। चुनाव आयोग के मुताबिक दिल्ली की 70 सीटों में से 48 पर बीजेपी जीत चुकी है, जबकि आम आदमी पार्टी के खाते में महज 22 सीट ही रहीं।
कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली, मगर कम से कम 12 सीटें ऐसी रहीं, जिस पर कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी (आप) को हरा दिया। साल 2020 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 53 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे, जबकि बीजेपी का वोट प्रतिशत 38.51 फीसदी रहा। इस बार की बात करें तो ‘आप’ को 43.57 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि बीजेपी 45.57 फीसदी वोट शेयर कर पहले नंबर पर काबिज हो गई। कहने को यह अंतर महज दो फीसदी का ही है, लेकिन दिल्ली के सिंहासन पर काबिज होने के लिए यह अंतर काफी बड़ा रहा। आखिर यह दो फीसदी वोट फिर कहां गए? जवाब साफ है-कांग्रेस। यूं तो इस बार भी कांग्रेस का वोट प्रतिशत 10 फीसदी से कम ही रहा, लेकिन खुद को ‘वोट कटवा’ पार्टी साबित करने में इस बार वह कामयाब रही। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस को 6.35 फीसदी वोट मिले और जीत-हार का अंतर दो फीसदी।
केजरीवाल-सिसोदिया समेत बड़े नेताओं पर भारी
अरविंद केजरीवाल तीन बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। लगातार तीन बार नई दिल्ली सीट से जीते, मगर इस बार बीजेपी के प्रवेश साहिब सिंह ने 4000 वोटों से हरा दिया। रोचक बात है कि तीसरे नंबर पर रहने वाले पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे व पूर्व कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित 4500 से ज्यादा वोट मिले। इसी तरह ‘आप’ में नंबर-2 मनीष सिसोदिया जंगपुरा से 675 वोटों से हारे। तीसरे नंबर पर रहे कांग्रेस के फरहाद सूरी को 7000 से ज्यादा वोट मिले। सोमनाथ भारती की हार में भी कांग्रेस का ही हाथ रहा। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और ईवीएम पर सवाल उठाने वाले सौरभ भारद्वाज 3100 वोटों से सीट गंवा बैठे। इनकी हार में भी एक चीज कॉमन रही-कांग्रेस। तीसरे नंबर पर रहे कांग्रेस के गर्वित सांघवी ने 6700 से ज्यादा वोट हासिल किए। ऐसी करीब 17 सीटें हैं, जहां कांग्रेस ने फर्क पैदा कर दिया। मतलब अगर दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन होता तो शायद तस्वीर कुछ और हो सकती थी।








