सीजेपी प्रदर्शन: जंतर-मंतर आंदोलन हिंसा पर जांच समिति को शायद ही कोई शिकायत मिली: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि जुलाई में जंतर-मंतर पर सीजेपी के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित हिंसा और पुलिस ज्यादतियों की जांच के लिए उसके द्वारा नियुक्त उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (एचपीईसी) को अब तक प्रभावित लोगों से शायद ही कोई शिकायत मिली है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) आर सुभाष रेड्डी के नेतृत्व वाले एचपीईसी को पीड़ितों की ओर से अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत वीडियो क्लिप सहित सामग्री की जांच करने की अनुमति दी। पीठ ने समिति से कहा कि वह एक महीने के भीतर पुलिस ज्यादतियों पर अपनी रिपोर्ट सौंपे।
पैनल ने पीठ को बताया कि एक पोर्टल को सक्रिय करने और ऑनलाइन और भौतिक रूप से शिकायत दर्ज करने के लिए एक समर्पित ईमेल पता प्रदान करने के बावजूद, इसे शायद ही कोई प्रतिक्रिया मिली हो, पैनल ने याचिकाकर्ताओं से आग्रह किया कि वे प्रभावित लोगों को समिति से संपर्क करने और घटनाओं के बारे में अपना विवरण प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहित करें।
इसमें कहा गया है कि जिन शिकायतों को फोन नंबर या अन्य निजी जानकारियों का खुलासा किए बिना गुमनाम रूप से दर्ज कराया जा सकता है, उनकी जांच पैनल को करनी चाहिए।
पीठ ने एचपीईसी द्वारा 31 अक्टूबर को दायर की गई कार्रवाई रिपोर्ट का अवलोकन किया और कहा कि समिति ने शिकायतों को आमंत्रित करने के लिए एक समर्पित पोर्टल बनाया था और 17 अक्टूबर को देश भर के 149 समाचार पत्रों में नोटिस जारी किया था, जिसमें लोगों से अपनी शिकायतें वर्चुअल या भौतिक रूप से या पंजीकृत डाक के माध्यम से प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘रिपोर्ट में आगे संकेत दिया गया है कि शायद ही कोई प्रतिक्रिया मिली और इसलिए समिति ने 21 अक्टूबर को फिर से विवरण दोहराया। प्रयासों के बावजूद, पोर्टल पर शायद ही कोई शिकायत प्राप्त हुई है और ईमेल पर कोई भी शिकायत नहीं मिली है।
पीठ ने कहा, ”हमने पक्षकारों के वकील से कहा है कि चूंकि शिकायतकर्ताओं/पीड़ितों के नामों का खुलासा करने की कोई आवश्यकता नहीं है, इसलिए उनके पास मौजूद पूरी सामग्री को एचपीईसी या पोर्टल के दिए गए पते पर भेज दिया जाए, ताकि वह ऐसी सामग्री पर विचार कर सके। अदालत के समक्ष दायर याचिकाओं/हलफनामों को समिति के पास भेजा जाए।
शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि कथित घटनाओं से संबंधित याचिकाएं, वीडियो और शिकायतें पैनल को भेजी जाएं, जिसमें पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रविशंकर झा, दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति शालिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के सेवानिवृत्त डीजीपी एल आर बिश्नोई शामिल हैं।
अदालत ने बिश्नोई के निजी कारणों से पैनल से मुक्त होने के अनुरोध को भी स्वीकार कर लिया।
पीठ ने समिति से कहा कि वह शिकायतों के लिए अनिश्चित काल तक इंतजार न करे और पहले से प्राप्त सामग्री के आधार पर तथ्यान्वेषी अभ्यास को आगे बढ़ाए।
पीठ ने कहा कि एचपीईसी ने 29 अक्टूबर को अपने कार्यालय में बैठक की थी और प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से प्रचार किया गया था। हालांकि, उस दिन केवल एक शिकायतकर्ता उसके समक्ष पेश हुआ और एक हलफनामा प्रस्तुत किया।
कुछ पुलिसकर्मी भी समिति के सामने पेश हुए थे।
कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने एचपीईसी की रिपोर्ट का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने पोर्टल खुलने से पहले ही एक अभ्यावेदन प्रस्तुत किया था और इसके लॉन्च के बाद एक और दायर किया था। उन्होंने कहा कि उन्हें बताया गया कि प्रस्तुतियों पर उचित समय पर विचार किया जाएगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा शीर्ष अदालत के समक्ष पहले से ही रखी गई सामग्री, जिसमें कथित तौर पर पुलिस ज्यादती के मामले सामने आए हैं, को जांच के लिए समिति के पास भेजा जा सकता है, बजाय इसके कि प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से संपर्क करने की आवश्यकता हो।
केंद्र और दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जनहित याचिकाकर्ताओं को घटनाओं की व्यक्तिगत जानकारी नहीं हो सकती है और यह उचित होगा कि हिंसा के पीड़ित खुद आगे आएं।
ग्रोवर ने आरोप लगाया कि हिंसा और पुलिस ज्यादतियों के कथित मामलों के संबंध में एक भी प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है।
शंकरनारायणन ने कहा कि हालांकि शीर्ष अदालत के पहले के आदेश में स्पष्ट किया गया था कि समिति के गठन से कदाचार करने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई को नहीं रोका जा सकेगा, लेकिन ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई है।








