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Shibu Soren : ‘धनकटनी आंदोलन’ से ‘दिशोम गुरु’ बने शिबू सोरेन

अलग झारखंड राज्य की मुहिम छेडऩे वाले शिबू सोरेन ने साठ के दशक में आदिवासियों और पिछड़े तबके के लोगों को भूमि अधिकार और मजदूरों को उनका हक दिलाने के लिए ‘धनकटनी आंदोलन’ शुरू किया, जिसकी वजह से उन्हें ‘दिशोम गुरु’ कहा जाने लगा। धनकटनी आंदोलन ने शिबू सोरेन को एक नई पहचान दी, सालों से सताए आदिवासियों को शिबू में अपना नायक दिखने लगा, जो उन्हें सूदखोरी से, महाजनी से और शोषण से आजादी दिला सकता था। शिबू सोरेन के इलाके में जो महाजन थे, वे महंगे ब्याज दर पर किसानों को कर्ज देते थे और फसल कटने पर मूलधन का डेढ़ गुना वसूल करते थे। इस दौरान शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन ने इन महाजनों के खिलाफ आवाज उठाई। महाजनों के विरोध के कारण सोबरन सोरेन की हत्या कर दी गई। पिता की हत्या ने शिबू को झकझोर दिया। होस्टल में पढ़ाई कर रहे शिबू का मन पढ़ाई से उचट गया। उन्होंने हजारीबाग में फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता लाल केदार नाथ सिन्हा के पास शरण ली और महाजनों के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया।

इस दुखद घटना ने उन्हें सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन की राह दिखाई। पिता की हत्या शिबू सोरेन के जीवन की ऐसी घटना बन गई, जिसने उनके दिल में न्याय और समानता की ज्वाला जला दी। शिबू सोरेन ने महाजनी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने का संकल्प लिया। उन्होंने अपने गांव के आदिवासियों को संगठित किया और ‘धनकटनी आंदोलन’ शुरू किया। उनका यह आंदोलन केवल उनके साहस को ही नहीं दर्शाता है, बल्कि एक ऐसा इतिहास रचता है, जिसने झारखंड के आदिवासियों को उनकी शक्ति का एहसास कराया था। शिबू सोरेन ने आदिवासी समाज को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने और नशे से दूर रखने के लिए काफी प्रयास किए । बाइक पर गांव-गांव घूमकर उन्होंने आदिवासियों को उनके अधिकारों के लिए जागरूक किया। इस आंदोलन ने उन्हें स्थानीय लोगों का नायक बना दिया। संथाल समुदाय ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ का खिताब दिया, जो आज भी उनके नाम के साथ जुड़ा है।

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