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मनरेगा योजना को खत्म करना गरीबों को रोटी से वंचित करने की चाल: हरभजन सिंह ई.टी.ओ.

चंडीगढ़, 30 दिसंबर:

मनरेगा अधिनियम को समाप्त कर उसके स्थान पर लाए गए नए कानून के विरोध में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार द्वारा आज पंजाब विधानसभा में आयोजित सत्र के दौरान पेश किए गए प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कैबिनेट मंत्री हरभजन सिंह ई.टी.ओ. ने कहा कि मनरेगा योजना को खत्म करना गरीबों को रोटी से वंचित करने की साजिश है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार संघवाद के सिद्धांत के विपरीत जाकर राज्यों के अधिकारों को समाप्त करने की राह पर चल पड़ी है, जिसका प्रमाण बी.बी.एम.बी., पंजाब विश्वविद्यालय और चंडीगढ़ से जुड़े पिछले समय में उत्पन्न हालात हमारे सामने हैं।

कैबिनेट मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार बहाने बनाकर राज्य सरकारों के अधिकारों को खत्म करने और उन्हें कमजोर करने की चालें चल रही है।

उन्होंने कहा कि संविधान में मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।

हरभजन सिंह ई.टी.ओ. ने कहा कि केंद्र सरकार ने वर्ष 1993 में 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से 29 अधिकार ग्राम पंचायतों को दिए थे। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए नरेगा की शुरुआत की गई थी, जिसमें गांव की पंचायतों की जरूरतों के अनुसार कार्यों के नियम बनाए गए थे, जिससे गांवों की आवश्यकताओं के अनुसार फंड प्राप्त होते थे और विकास कार्य संपन्न होते थे। लेकिन इस नए अधिनियम के तहत पंचायतों को दिए गए 29 अधिकारों को लागू करना कठिन हो जाएगा, क्योंकि पंचायतें न तो अपने कार्य सुचारु रूप से चला सकेंगी और न ही अपनी जरूरतों के अनुसार नीतियां बना पाएंगी।

उन्होंने कहा कि इस नए अधिनियम के साथ ‘राइट टू वर्क’ (काम का अधिकार) को लागू करना भी मुश्किल हो जाएगा।

कैबिनेट मंत्री ने आगे कहा कि वर्ष 1935 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट टकराव वाले संघवाद पर आधारित था, लेकिन संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने सहकारी संघवाद (कोऑपरेटिव फेडरलिज्म) का सिद्धांत लागू किया। दुर्भाग्यवश, मौजूदा केंद्र सरकार अप्रत्यक्ष रूप से फिर से 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार राज्यों और केंद्र के बीच टकराव वाली राजनीति को बढ़ावा दे रही है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि नया कानून दलित विरोधी है, क्योंकि मनरेगा में काम करने वाले लगभग 73 प्रतिशत श्रमिक दलित समुदाय से संबंधित हैं।

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