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दालों की महत्ता को देखते हुए किसान ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती करें — यादविंदर सिंह

खडूर साहिब, 14 फरवरी:

 

गुरजीत सिंह बराड़, निदेशक कृषि पंजाब के निर्देशों के अनुसार फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने हेतु किसानों के लिए विभिन्न पहल की जा रही हैं। जिला उपायुक्त राहुल तथा मुख्य कृषि अधिकारी तेजबीऱ सिंह भंगू के दिशा-निर्देशों के तहत किसानों को गेहूं की कटाई और आलू की खुदाई के बाद ग्रीष्मकालीन दालों की बुवाई के लिए कार्यक्रमों व शिविरों के माध्यम से जागरूक किया जा रहा है।

 

इसी कड़ी में ब्लॉक कृषि अधिकारी भूपिंदर सिंह के नेतृत्व में यादविंदर सिंह द्वारा विभिन्न गांवों का दौरा किया गया। किसानों से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि दालें मानव आहार का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और इनमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। पंजाब में सामान्यतः गेहूं–धान फसल चक्र अपनाए जाने के कारण दालों के रकबे में काफी कमी आई है।

 

उन्होंने बताया कि ग्रीष्मकालीन मूंग कम अवधि में तैयार होने वाली एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। इसकी खेती से किसान न केवल अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि भूमि की उर्वरता में सुधार के साथ खाली पड़ी जमीन का भी उपयोग कर सकते हैं।

 

उन्होंने कहा कि मूंग अन्य दालों की तुलना में अधिक गर्मी सहन कर सकती है, इसलिए इसकी खेती के लिए गर्म जलवायु उपयुक्त है। अच्छी जल निकासी वाली दोमट से बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम है। मूंग की खेती हेतु एसएमएल-1827, एसएमएल-832, एसएमएल-668 तथा टीएमबी-37 किस्मों की सिफारिश की गई है। ये किस्में 60–65 दिनों में पक जाती हैं और औसत उपज 4–5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

 

मूंग की बुवाई 20 मार्च से अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक की जा सकती है। बुवाई से पहले बीज का फफूंदनाशक या जैविक विधि से उपचार करने से उपज बढ़ती है और रोगों से बचाव होता है। गेहूं की कटाई के बाद बिना जुताई के जीरो टिल ड्रिल या हैप्पी सीडर से भी मूंग की बुवाई की जा सकती है। बुवाई के समय 11 किलोग्राम यूरिया और 100 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट प्रति एकड़ डालने की सलाह दी गई है। आलू की खुदाई के बाद मूंग की खेती बिना किसी खाद के भी की जा सकती है।

 

खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के दो दिनों के भीतर 1 लीटर पेंडिमेथालिन 30 ईसी को 150–200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सिफारिश की गई है। मौसम और मिट्टी के अनुसार मूंग की फसल को 3–5 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। फसल पर सामान्यतः थ्रिप्स और फली छेदक कीट का प्रकोप होता है, जिसकी रोकथाम के लिए 600 मिलीलीटर ट्राइजॉफॉस 40 ईसी या 100 मिलीलीटर डाइमिथोएट को 80–100 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

 

इस प्रकार दालों की खेती अपनाकर प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर जल की बचत के साथ-साथ भूमि की सेहत में भी सुधार किया जा सकता है। इस अवसर पर सुखदेव सिंह, कमलजीत कौर (सहायक प्रौद्योगिकी प्रबंधक), बलराज सिंह, हरदयाल सिंह तथा गांव के प्रगतिशील किसान भी उपस्थित थे।

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