
चंडीगढ़, 16 मार्च:
देश द्वारा उनकी 92वीं जयंती मनाने के ठीक एक दिन बाद, प्रसिद्ध समाज सुधारक और राजनीतिक नेता बाबू कांशीराम जी को भारत रत्न देने की मांग करता एक ऐतिहासिक प्रस्ताव आज पंजाब विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया। पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा द्वारा पेश इस प्रस्ताव में केंद्र सरकार से अपील की गई है कि उन्हें मरणोपरांत देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया जाए। इस प्रस्ताव को पूरे सदन का सर्वसम्मत समर्थन मिला और पंजाब सरकार इस सिफारिश को केंद्र को भेजेगी।
प्रस्ताव पेश करते हुए हरपाल सिंह चीमा ने नेता को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि बाबू कांशीराम ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की विचारधारा के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सामाजिक-आर्थिक समानता का संदेश घर-घर तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि कांशीराम जी ईमानदारी के प्रतीक थे और उन्होंने अपने नाम पर कोई संपत्ति या बैंक खाता नहीं रखा।
उन्होंने आगे कहा कि बाबू कांशीराम ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करने के लिए पुणे में एक गजटेड अधिकारी के रूप में अपना करियर छोड़ दिया। पहले BAMCEF की स्थापना कर और बाद में सक्रिय राजनीति में आकर उन्होंने हजारों युवाओं को राष्ट्रीय राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया।
उनके जीवन और राजनीतिक सफर पर प्रकाश डालते हुए हरपाल सिंह चीमा ने बताया कि बाबू कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को रोपड़ के खवासपुरा में हुआ था और उन्होंने सरकारी कॉलेज, रोपड़ से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने 1991 में उत्तर प्रदेश के इटावा और 1996 में पंजाब के होशियारपुर से सांसद के रूप में सेवा की तथा बाद में राज्यसभा सदस्य भी रहे।
नेता की विरासत के सम्मान में हाल की पहलों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि अपने कैबिनेट सहयोगी हरजोत सिंह बैंस के साथ उन्होंने खवासपुरा और पिरथीपुर बुंगा का दौरा किया। उनकी स्मृति में एक स्कूल के पुनर्निर्माण और उन्नयन के लिए 2 करोड़ रुपये की ग्रांट दी गई है, जिसका नाम उनके नाम पर रखा जाएगा। इसके अलावा, उनके पैतृक गांव में एक उच्च स्तरीय पुस्तकालय और आधुनिक ऑडिटोरियम बनाने को भी मंजूरी दी गई है।
उन्होंने यह भी कहा कि अरविंद केजरीवाल ने 2016 में ही औपचारिक रूप से बाबू कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग उठाई थी। हालांकि 9 अक्टूबर 2006 को उनके निधन के बाद भी तत्कालीन केंद्र सरकार दिल्ली में उनके स्मारक के लिए उपयुक्त भूमि उपलब्ध कराने में असफल रही।
अंत में, हरपाल सिंह चीमा ने सदन से इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित करने की अपील की, जिसे पूरे सदन ने समर्थन देते हुए पारित कर दिया।









