पंजाबराजनीति

चंडीगढ़, 1 मई 2026

अब तक भगवंत सिंह मान सरकार की ‘मुख्यमंत्री स्वास्थ्य योजना’ के तहत लगभग 1 लाख डायलिसिस सत्र पूरे किए जा चुके हैं, जिन पर करीब ₹16.5 करोड़ खर्च किए गए हैं।

भारत में क्रोनिक किडनी डिजीज (दीर्घकालिक गुर्दा रोग) के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में सरकार द्वारा समर्थित कैशलेस डायलिसिस योजनाएं मरीजों के लिए जीवनरेखा साबित हो रही हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इलाज की सफलता अभी भी उसकी उपलब्धता और वहन करने की क्षमता पर अधिक निर्भर करती है।

लुधियाना के रहने वाले ध्यान सिंह सप्ताह में दो बार अस्पताल जाते हैं। लंबे समय से डायलिसिस करा रहे मरीजों की तरह उन्हें भी नियमित इलाज के बावजूद कई शारीरिक और मेटाबोलिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन ‘स्वास्थ्य कार्ड’ के माध्यम से मिल रही आर्थिक सहायता से उन्हें राहत मिली है। अब तक वे कई बार कैशलेस इलाज का लाभ उठा चुके हैं। उनका कहना है कि योजना में पंजीकरण के बाद उनका डायलिसिस मुफ्त हो गया है।

क्रोनिक किडनी डिजीज से पीड़ित मरीजों के लिए जीवन अब दिनों या हफ्तों में नहीं, बल्कि मशीन के चक्रों में सिमट जाता है। सप्ताह में दो से तीन बार, लगभग चार घंटे तक खून को डायलिसिस मशीन से फिल्टर कर शरीर में वापस डाला जाता है। यह प्रक्रिया जीवन को बनाए रखती है, लेकिन पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं करती।

भारत में यह बीमारी एक गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है, जिसका सीधा संबंध मधुमेह और उच्च रक्तचाप के बढ़ते मामलों से है। हर साल लाखों मरीज एंड-स्टेज किडनी डिजीज तक पहुंच जाते हैं, जहां जीवित रहने के लिए लंबे समय तक डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट आवश्यक हो जाता है। वैश्विक स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसे तेजी से बढ़ती गैर-संचारी बीमारियों में शामिल करता है।

निजी अस्पतालों में एक डायलिसिस सत्र की लागत ₹1,500 से ₹4,000 के बीच होती है। अधिकांश मरीजों को सप्ताह में 2–3 सत्रों की जरूरत पड़ती है, जिससे सालाना खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाता है—जो बिना आर्थिक सहायता के अधिकांश परिवारों के लिए भारी बोझ है।

ऐसी स्थिति में ‘मुख्यमंत्री स्वास्थ्य योजना’ जैसी सरकारी पहलें इलाज की बाधाओं को कम करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। इस योजना के तहत सरकारी और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में मुफ्त डायलिसिस सेवाएं प्रदान की जा रही हैं, जिससे मरीजों का जेब खर्च कम हुआ है और वे इलाज बीच में छोड़ने से बच रहे हैं।

स्वास्थ्य मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने कहा,
“अब तक योजना के तहत 1 लाख मुफ्त डायलिसिस सत्र प्रदान किए जा चुके हैं, जिनकी लागत ₹16.5 करोड़ है। कोई भी मरीज पैसे की कमी के कारण डायलिसिस से वंचित नहीं रहना चाहिए।”

मोगा के एक अस्पताल के नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. सौरव गोयल के अनुसार, डायलिसिस में आर्थिक सहायता का असर केवल सुविधा तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि डायलिसिस इलाज नहीं, बल्कि जीवन को बनाए रखने की प्रक्रिया है। यदि मरीज एक-दो सत्र भी छोड़ दे, तो शरीर में विषैले तत्व तेजी से जमा हो सकते हैं, जो जानलेवा साबित हो सकते हैं। कैशलेस सुविधा से इलाज में निरंतरता बनी रहती है—और यही मरीज के जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में सबसे बड़ी चुनौती बीमारी की समय पर पहचान है। अधिकतर मरीज तब इलाज के लिए पहुंचते हैं, जब किडनी काफी हद तक खराब हो चुकी होती है और विकल्प केवल डायलिसिस या प्रत्यारोपण तक सीमित रह जाते हैं।

मेडिकल शोध यह भी दर्शाते हैं कि देश में किडनी रोग से पीड़ित बड़ी संख्या में मरीज भारी आर्थिक बोझ झेलते हैं, जिसके कारण कई परिवार कुछ ही महीनों में अपनी बचत खत्म कर देते हैं या कर्ज में डूब जाते हैं।

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