
नई दिल्ली-सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को सुनने से मना कर दिया है, जिसमें डाक्टरों के लिए दवाओं के दुष्प्रभाव मरीजों को बताना अनिवार्य करने की मांग की गई थी। जस्टिस बीआर गवई और केवी विश्वनाथन की बैंच ने इस मांग को अव्यवहारिक बताया। केरल के एर्नाकुलम के रहने वाले याचिकाकर्ता जैकब वडक्कनचेरी की तरफ से पेश वकील प्रशांत भूषण ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोग दवाओं के दुष्प्रभाव का शिकार होते हैं। डाक्टरों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वह दवा का पर्चा लिखते समय हर दवा के साइड इफेक्ट की जानकारी भी दर्ज करें। इस पर जजों ने कहा कि इस तरह तो डाक्टर पूरे दिन में 10-15 मरीजों से ज्यादा को देख ही नहीं पाएगा।
भूषण ने कहा कि डाक्टर पहले से छपे हुए फॅर्मेट में दवाओं के साइड इफेक्ट की जानकारी दर्ज कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि हर मरीज को अलग दवाएं दी जाती हैं। पहले से लिखे फार्मेट का सुझाव भी व्यवहारिक नहीं लगता। स्वास्थ्य केंद्रों में पहले से बहुत भीड़ है। ऐसे में डाक्टर हर मरीज के प्रेस्क्रिप्शन पर दवाओं के साइड इफेक्ट लिखने का समय कैसे निकाल सकते हैं। डाक्टर पहले ही इस बात से परेशान हैं कि उनके काम को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत रख दिया गया है।









