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नशे की लत से रोजगार तक: नशे से उबरने की कहानियां भगवंत सिंह मान सरकार की ‘युद्ध नशों के विरुद्ध’ मुहिम की जमीनी स्तर पर प्रभावशीलता का प्रत्यक्ष प्रमाण।

चंडीगढ़, 20 मार्च:

पंजाब में नशे के खिलाफ छेड़ी गई मुहिम के चलते स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहे हैं, क्योंकि भगवंत सिंह मान सरकार द्वारा ‘युद्ध नशों के विरुद्ध’ अभियान के तहत केवल सख्ती ही नहीं, बल्कि पुनर्वास और समाज में दोबारा शामिल करने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विभिन्न जिलों में नशे की गिरफ्त में फंसे लोग अब सामान्य और स्थिर जीवन की ओर लौट रहे हैं, जहां रोजगार उनकी वापसी में अहम भूमिका निभा रहा है।

अभिषेक कुमार (बदला हुआ नाम) भी ऐसे ही लोगों में से एक हैं जिन्होंने इस बदलाव को खुद महसूस किया। कुछ साल पहले नशे की लत ने उनकी जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर दिया था। रोजमर्रा के काम भी मुश्किल हो गए थे और परिवार को डर था कि वह नशे का शिकार हो जाएंगे। आज वह एक स्थिर नौकरी कर रहे हैं और अपने परिवार के साथ फिर से सामान्य जीवन जी रहे हैं। उन्होंने कहा, “नौकरी मिलने से सब कुछ बदल गया। इसने मुझे सही रास्ते पर चलने का कारण दिया।”

उनका नशा छोड़ना अचानक नहीं हुआ। परिवार के निरंतर सहयोग, व्यवस्थित चिकित्सा उपचार, काउंसलिंग और ‘युद्ध नशों के विरुद्ध’ अभियान से जुड़े पुनर्वास प्रयासों के साथ रोजगार सहायता मिलने के बाद वह आत्मविश्वास और स्थिरता हासिल कर पाए।

नवदीप कुमार (बदला हुआ नाम) के जीवन में भी बदलाव की शुरुआत उनके घर से हुई। लगातार पारिवारिक तनाव और भावनात्मक दूरी ने उन्हें अपनी स्थिति का एहसास कराया। उन्होंने कहा, “मेरी मां ने मुझे सही रास्ते पर वापस लाया।” इलाज पूरा करने के बाद उन्हें रोजगार सहायता मिली और अब वह निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं। उनके अनुसार नौकरी ने उनके जीवन में अनुशासन और उद्देश्य दोनों लौटाए।

गुरजिंदर सिंह (बदला हुआ नाम) की कहानी भी इसी दिशा को दर्शाती है। नशे ने न केवल उनकी सेहत बल्कि आर्थिक स्थिति और पारिवारिक भरोसे को भी नुकसान पहुंचाया था। पुनर्वास सेवाओं और माता-पिता के सहयोग से वह धीरे-धीरे ठीक हुए। आज वह नौकरी कर रहे हैं, उनकी सेहत में सुधार हुआ है और परिवार के साथ संबंध भी बेहतर हुए हैं।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि ‘आप’ सरकार की रणनीति केवल नशा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि नशे के शिकार लोगों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाने पर भी केंद्रित है। अधिकारियों के अनुसार पुनर्वास, काउंसलिंग और संस्थागत सहायता को रोजगार के अवसरों से जोड़ा जा रहा है, क्योंकि आर्थिक स्थिरता के बिना पूर्ण सुधार संभव नहीं है।

सभी मामलों में यह बात सामने आई है कि रोजगार केवल पुनर्वास के बाद का कदम नहीं, बल्कि नशा-मुक्त जीवन की मजबूत नींव है। यह आर्थिक स्वतंत्रता देता है, आत्मसम्मान को बहाल करता है और व्यक्ति को परिवार व समाज से दोबारा जोड़ता है।

अभिषेक ने अंत में संदेश दिया, “कभी भी नशा न करें। यह शुरुआत में छोटा लग सकता है, लेकिन यह पूरी जिंदगी बर्बाद कर सकता है।”

जैसे-जैसे ‘युद्ध नशों के विरुद्ध’ अभियान आगे बढ़ रहा है, ऐसी कहानियां यह दर्शाती हैं कि अब नशा मुक्ति को अंत नहीं, बल्कि एक सम्मानजनक और स्थिर जीवन की नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

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