
चंडीगढ़, 4 फरवरी:
पंजाब के निर्माण श्रमिक दशकों तक राज्य के सबसे उपेक्षित नागरिकों में रहे हैं। राज्य की सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और घरों के निर्माण में योगदान देने के बावजूद वे अभावों और गरीबी भरा जीवन जीने को मजबूर रहे। इस वर्ग के लिए कल्याण व्यवस्था अधिकांशतः कागज़ों तक ही सीमित थी। लेकिन अब भगवंत मान सरकार के कार्यकाल में उनकी स्थिति निर्णायक और सकारात्मक रूप से बदलनी शुरू हो गई है।
स्पष्ट रूप से इस बदलाव का मुख्य कारण शासन में आया परिवर्तन है। मजदूरों को फार्म भरने, दफ्तरों के चक्कर लगाने और अनावश्यक देरी के कारण परेशान होने से बचाने के लिए पंजाब सरकार ने सिस्टम का पुनर्गठन किया है। पंजाब बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड (बीओसीडब्ल्यू), जो पूरे राज्य में लगभग दो लाख पंजीकृत निर्माण श्रमिकों के लिए नोडल एजेंसी है, के बुनियादी ढांचे में सुधार किए गए हैं ताकि कामकाज में तेजी, सुव्यवस्था और जवाबदेही लाई जा सके।
उपेक्षा से जवाबदेही तक
पिछली सरकारें ऐसा सिस्टम छोड़ गई थीं, जिसमें कल्याणकारी लाभों की प्रक्रिया में औसतन 206 दिन लगते थे। लेबर कार्ड केवल एक वर्ष के लिए वैध होते थे, निर्माण श्रमिकों को लंबा इंतजार करना पड़ता था और यह भी निश्चित नहीं होता था कि सहायता मिलेगी भी या नहीं। इस प्रकार भगवंत मान सरकार को न केवल प्रशासनिक देरी विरासत में मिली, बल्कि वर्षों से चली आ रही उपेक्षा और गंभीर बकाया समस्याएं भी मिलीं।
सिस्टम में मामूली छेड़छाड़ करने के बजाय सरकार ने संरचनात्मक सुधारों को प्राथमिकता दी। मजदूरों को अपमानित करने वाली अनावश्यक शर्तों को हटा दिया गया। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रसूति लाभों के लिए बाल आधार की शर्त को समाप्त करना है। केवल वित्तीय सहायता पाने के लिए नवजात शिशु के आधार की मांग न तो उचित थी और न ही तर्कसंगत। यह प्रथा अब समाप्त हो चुकी है, जिससे कल्याण प्रक्रिया में बुनियादी सम्मान बहाल हुआ है।
मानवीय उद्देश्य के लिए उपयोगी तकनीक
पंजाब के सुधारों को अन्य राज्यों से अलग बनाता है यह तथ्य कि तकनीक का उपयोग केवल औपचारिकता के लिए नहीं, बल्कि परेशानियों और समस्याओं को कम करने के लिए किया गया है। आवेदन प्रक्रियाएं, जो पहले 11 चरणों से गुजरती थीं, अब सरल कर दी गई हैं। 14 योजनाओं में अनावश्यक अनुमतियों को हटा दिया गया है। विभाग अब आपस में डेटा साझा करते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि मजदूरों से वे दस्तावेज़ दोबारा न मांगे जाएं जो पहले से सरकार के पास मौजूद हैं।
पहले निर्माण श्रमिकों को फॉर्म जमा कराने के लिए बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे और फिर शिक्षा से जुड़े लाभों के लिए अलग से आधार सत्यापन करवाना पड़ता था। इससे न केवल रोज़ाना की आय का नुकसान होता था, बल्कि एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर भी लगाने पड़ते थे। अब, पूरा सिस्टम ऑनलाइन और तकनीक-आधारित होने के कारण श्रमिकों या उनके परिवारों को आधार सत्यापन या लिंकिंग के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। एक बार मूल विवरण जमा हो जाने के बाद प्रक्रिया स्वतः चलती रहती है, जिससे समय और धन की बचत होती है तथा अनावश्यक परेशानी भी कम होती है।
इसी प्रकार, स्वास्थ्य बीमा लाभ, जिसे अब 10 लाख रुपये तक बढ़ा दिया गया है, बिना किसी कागजी कार्यवाही के अस्पतालों में आपात स्थिति के दौरान निर्बाध उपचार सुनिश्चित करता है।
ठोस परिणाम, कोई बयानबाज़ी नहीं
इन सुधारों के परिणाम ठोस और स्पष्ट हैं। लाभों के लिए औसत प्रक्रिया समय 64 प्रतिशत घटकर 203 दिनों से 73 दिन रह गया है, जिसे आगे 45 दिनों तक लाने का लक्ष्य है। कल्याण वितरण में 67 प्रतिशत की वृद्धि हुई है—जो 2020-21 में 93 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 की पहली तीन तिमाहियों में 125 करोड़ रुपये हो गई है और वित्तीय वर्ष के अंत तक इसके 150 करोड़ रुपये पार करने का अनुमान है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस वर्ष अब तक 81,000 निर्माण श्रमिकों को लाभ मिल चुका है, जो पहले की तुलना में लगभग तीन गुना है।
ये आंकड़े वास्तविक बदलाव को दर्शाते हैं—स्कूल फीस का समय पर भुगतान, बिना कर्ज़ के चिकित्सा आपात सुविधाओं की उपलब्धता, विवाह के लिए शगुन सहायता के माध्यम से सम्मान की बहाली और नवजात बालिकाओं के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट के जरिए परिवारों को दीर्घकालिक सुरक्षा।
श्रम का सम्मान करने वाला शासन
हाल ही में आयोजित ‘किरत’ सम्मेलन ने इस बदली हुई सोच को उजागर किया। यह सम्मेलन बीओसीडब्ल्यू हैंडबुक के लॉन्च के माध्यम से सुधारों को एकीकृत करने और क्षेत्रीय स्तर पर उनके क्रियान्वयन को मजबूत करने का एक मंच बना। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह केवल घोषणाओं पर निर्भर न होकर सरकार की कल्याणकारी नीयत को दर्शाता है।
सुधारों पर बोलते हुए श्रम मंत्री तरुणप्रीत सिंह सौंद ने जोर देकर कहा,
“मुख्यमंत्री भगवंत मान की दूरदर्शी नेतृत्व में पंजाब न केवल विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा—जैसे स्कूल, अस्पताल और सड़कें—बना रहा है, बल्कि उन्हें बनाने वाले श्रमिकों को भी सम्मान दे रहा है। ये सभी बड़े सुधार निर्माण श्रमिकों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण हैं। मैं सभी निर्माण श्रमिकों से अपील करता हूं कि वे पंजाब बीओसीडब्ल्यू बोर्ड में पंजीकरण करवाएं और विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाएं।”
पंजाब के इन सुधारों को देश के अन्य हिस्सों के लिए एक मॉडल के रूप में भी देखा जा रहा है। ऐसे समय में जब कई राज्यों और यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर पर भी श्रमिक कल्याण और अधिकारों की उपेक्षा हो रही है, पंजाब ने श्रम कल्याण को प्राथमिकता दी है। निर्माण श्रमिकों की जरूरतों को केंद्र में रखकर और उन्हें समय पर लाभ पहुंचाकर पंजाब अन्य राज्यों और देश के लिए एक मिसाल कायम कर रहा है।
एक ऐसे दौर में, जहां कल्याण अक्सर केवल बयानबाज़ी और नारों तक सीमित रह जाता है, वहां पंजाब के निर्माण श्रमिकों के लिए किए गए सुधार अपनी गंभीरता, व्यापकता और ठोस परिणामों के कारण अलग पहचान बनाते हैं। श्रमिकों के साथ विश्वास और सम्मान से पेश आकर राज्य ने यह साबित किया है कि कल्याण कोई दान नहीं, बल्कि श्रमिकों का अधिकार है।









