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ग्लोबल सिख काउंसिल द्वारा धार्मिक आज़ादी, तकनीकी विकृति और गुरमुखी के मुद्दे संसद में उठाने के लिए पहल।

चंडीगढ़, 18 अप्रैल 2026: 28 देशों में सिख संस्थाओं की प्रतिनिधि संस्था ग्लोबल सिख काउंसिल के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में राज्यसभा सदस्य विक्रमजीत सिंह साहनी से मुलाकात कर सिखों की धार्मिक आज़ादी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के माध्यम से पवित्र गुरबाणी, गुरु साहिबान और सिख संस्थाओं के अपमान तथा भाषाई विरासत के संरक्षण से जुड़े अहम मुद्दों पर तुरंत विधायी और प्रशासनिक कदम उठाने की मांग की।

अमेरिका से काउंसिल के उपाध्यक्ष सरदार परमजीत सिंह बेदी की अगुवाई में प्रतिनिधिमंडल ने आधुनिक तकनीकों के दुरुपयोग और सिख समुदाय के सामने खड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए इन मुद्दों को संसदीय स्तर पर उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

इस बैठक में काउंसिल के कोषाध्यक्ष सरदार हरसरन सिंह पुडुचेरी, अफगानिस्तान से सदस्य सरदार गुलजीत सिंह तथा ‘सिख कलेक्टिव’ के संयोजक सरदार जगमोहन सिंह भी शामिल थे। काउंसिल की अध्यक्ष डॉ. कंवलजीत कौर यूके का संदेश देते हुए सरदार बेदी ने संसद में सिख मुद्दों को मजबूती से उठाने के लिए सरदार साहनी के प्रयासों की सराहना की। प्रतिनिधिमंडल ने विशेष रूप से पंजाब सहित विभिन्न क्षेत्रों में युवाओं के लिए शिक्षा और कौशल विकास के प्रयासों की भी प्रशंसा की।

बैठक के दौरान कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई, जिनमें सबसे प्रमुख देशभर में विभिन्न परीक्षाओं के दौरान सिख विद्यार्थियों को उनके ककारों को लेकर आने वाली समस्याएं रहीं। अमृतधारी परीक्षार्थियों को अक्सर कड़ा, कृपाण और दस्तार जैसे धार्मिक प्रतीक हटाने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे उनकी गरिमा और संवैधानिक धार्मिक अधिकारों को ठेस पहुंचती है। काउंसिल ने इस मुद्दे का तुरंत समाधान करने की मांग की।

इसके अलावा काउंसिल ने “तकनीकी बेअदबी” को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की, जिसके तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई डिजिटल तकनीकों के जरिए गुरबाणी, सिख संस्थाओं और सिख सिद्धांतों को सोशल मीडिया पर तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रतिनिधिमंडल ने केंद्र सरकार से अपील की कि ऐसी भ्रामक और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली डिजिटल सामग्री पर रोक लगाने के लिए सख्त नियम बनाए जाएं, ताकि सिख मर्यादा की पवित्रता बनी रहे।

इसके अतिरिक्त सिख इतिहास, पहचान और धार्मिक मूल्यों से जुड़े मामलों में संतुलित और तथ्य आधारित मूल्यांकन सुनिश्चित करने के लिए प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड में एक योग्य सिख विद्वान की नियुक्ति की मांग भी की।

साथ ही दिल्ली की पंजाबी अकादमी की खराब प्रशासनिक स्थिति पर चिंता जताते हुए इसकी कार्यप्रणाली की समीक्षा करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया, ताकि राजधानी में बसे सिखों के बीच पंजाबी भाषा, साहित्य और संस्कृति को मजबूत किया जा सके।

काउंसिल ने ‘केंद्रीय गुरमुखी विश्वविद्यालय’ स्थापित करने की मांग करते हुए इसे केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की तर्ज पर राष्ट्रीय दर्जा और पूर्ण संस्थागत सहयोग देने की मांग की। प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि पंजाबी भाषा और गुरमुखी लिपि केवल सांस्कृतिक ही नहीं, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए पंजाबी भाषा की उन्नति, संरक्षण और प्रचार के लिए एक विशेष राष्ट्रीय संस्था की स्थापना आवश्यक है।

इन सभी मुद्दों पर सरदार साहनी ने प्रतिनिधिमंडल को पूरा सहयोग देने का भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि वे इन मुद्दों को संसद में उठाएंगे और संबंधित केंद्रीय मंत्रियों के साथ लिखित पत्रों के माध्यम से भी साझा करेंगे। उन्होंने समुदाय की भलाई तथा धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए हर प्रयास में सहयोग देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

बैठक के दौरान सरदार साहनी को इसी वर्ष अक्टूबर माह में चंडीगढ़ में होने वाली काउंसिल की वार्षिक बैठक में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

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